वो देखो दौड़ के मंज़िल पे जा पहुँचा,
कौन कहता है के,'झूठ के पाँव ' नही होते.
मैं चीख चीख के सब को बताता रह गया,
फिर ना कहना,'दीवारों के भी कान' होते हैं.
सारे हाक़िम लपक कर उसके पाँव छू आए,
तब मैं जान गया,'क़ानून के हाथ' लंबे हैं
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Dear Lalit,
ReplyDeleteI am sure you will like this one too!
http://sachmein.blogspot.com/2009/04/blog-post_18.html